उत्तराखंड

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की सीमाएं और सवाल

देहरादून/तहलका न्यूज़18

भारत के संघीय ढांचे में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का राज्य क्षेत्राधिकार एक ऐसा संवेदनशील और बहुपरतीय मुद्दा बन चुका है, जो केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक, संवैधानिक और नैतिक प्रश्नों को भी अपने भीतर समेटे हुए है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह विभिन्न राज्यों—विशेषकर विपक्षी शासित राज्यों—ने सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति (जनरल कंसेंट) वापस ली है, उसने इस बहस को और अधिक तीखा बना दिया है। यह सवाल बार-बार उठाया जा रहा है कि क्या सीबीआई वास्तव में एक निष्पक्ष जांच एजेंसी है या फिर वह केंद्र सरकार के प्रभाव में काम करने वाली संस्था बनती जा रही है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का यह दावा है कि राज्य सरकारें अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार जांच एजेंसियों के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर रही हैं। सच इन दोनों अतियों के बीच कहीं स्थित है।

सीबीआई की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र को समझने के लिए दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम, 1946 (डीएसपीई अधिनियम) को समझना आवश्यक है। यही वह कानून है जो सीबीआई को वैधानिक आधार प्रदान करता है। इस अधिनियम की धारा 6 स्पष्ट रूप से कहती है कि किसी राज्य में सीबीआई को अपनी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए संबंधित राज्य सरकार की सहमति आवश्यक होगी। यही प्रावधान भारतीय संघवाद की उस भावना को दर्शाता है, जिसमें राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान किया गया है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यह सहमति पूर्ण और अपरिहार्य नहीं है। कानून में ऐसे कई अपवाद मौजूद हैं, जहां सीबीआई बिना राज्य की सहमति के भी जांच कर सकती है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी मामले में उच्चतम न्यायालय या संबंधित उच्च न्यायालय सीबीआई जांच का आदेश देता है, तो राज्य सरकार की सहमति की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार के कर्मचारियों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों में, या केंद्रीय कानूनों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में भी सीबीआई को स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है। वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया एक महत्वपूर्ण निर्णय इस संदर्भ में उल्लेखनीय है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करने के लिए राज्य की सहमति आवश्यक नहीं है। यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि राज्य की शक्ति सीमित है और उसे राष्ट्रीय हित तथा न्यायिक प्रक्रिया के सामने झुकना पड़ सकता है।

भारतीय संविधान का संघीय ढांचा भी इस पूरे विवाद को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत को एक “सहकारी संघवाद” का उदाहरण माना जाता है, लेकिन यह पूर्णतः विकेंद्रीकृत नहीं है। सातवीं अनुसूची में कानून-व्यवस्था को राज्य सूची में रखा गया है, जिसका अर्थ है कि सामान्य परिस्थितियों में यह राज्यों का विषय है। लेकिन अनुच्छेद 246 और 254 के तहत केंद्र को विशेष परिस्थितियों में प्रधानता प्राप्त है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी ताकि राष्ट्रीय एकता और कानून का शासन किसी भी स्थिति में कमजोर न पड़े।

यहीं से यह टकराव उत्पन्न होता है। एक ओर राज्य अपनी संवैधानिक स्वायत्तता का हवाला देते हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्र यह तर्क देता है कि राष्ट्रीय हित और व्यापक न्याय व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए उसके पास हस्तक्षेप करने का अधिकार होना चाहिए। 2018 के बाद से पश्चिम बंगाल, पंजाब, तेलंगाना, केरल, झारखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और अन्य कई राज्यों ने सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली है। सामान्य सहमति का अर्थ होता है कि सीबीआई राज्य में बिना हर बार अनुमति लिए जांच शुरू कर सकती है। इसकी वापसी के बाद सीबीआई को हर मामले में अलग से अनुमति लेनी पड़ती है, जिससे जांच प्रक्रिया धीमी और जटिल हो जाती है।

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